अंजाम-ए-इश्क


एक ठंड की शाम, ना था जो कोई काम,
तो लेते उनका नाम, थे बैठे दिल को थाम ||

कि कुछ यार आये, बोले – “क्या हुआ मियां गुलफाम?
छोड़ो ये रोना धोना, लो चढाओ एक जाम!
मिलना-बिछड़ना, यही ज़िन्दगी है,
मौज करो – ना करो इसे गम के नाम”

हर इश्क की दास्ताँ का, है बस यही अंजाम,
बना देती है ये लायक्मंदो को नालायक, नाकारा, और नाकाम ||

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मेरी कविता


कविता, हाँ, मेरी कविता,
जैसे मेरे भावों की एक निर्मल, बहती सरिता ||

इनमे प्रेम है, कटाक्ष है,
मेरे मनोभावों का, दिखता इनमे प्रत्याक्ष है ||

ये मेरा जीवन हैं, मेरे ह्रदय का दर्पण हैं,
कुछ मेरे मित्रों, कुछ, मेरे देश को अर्पण हैं ||

ये मेरे सुख का राग, दुःख की रागिनी हैं,
ये मेरी हर जीत, हर हार की संगिनी हैं ||

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