अंजाम-ए-इश्क


एक ठंड की शाम, ना था जो कोई काम,
तो लेते उनका नाम, थे बैठे दिल को थाम ||

कि कुछ यार आये, बोले – “क्या हुआ मियां गुलफाम?
छोड़ो ये रोना धोना, लो चढाओ एक जाम!
मिलना-बिछड़ना, यही ज़िन्दगी है,
मौज करो – ना करो इसे गम के नाम”

हर इश्क की दास्ताँ का, है बस यही अंजाम,
बना देती है ये लायक्मंदो को नालायक, नाकारा, और नाकाम ||

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मेरी कविता


कविता, हाँ, मेरी कविता,
जैसे मेरे भावों की एक निर्मल, बहती सरिता ||

इनमे प्रेम है, कटाक्ष है,
मेरे मनोभावों का, दिखता इनमे प्रत्याक्ष है ||

ये मेरा जीवन हैं, मेरे ह्रदय का दर्पण हैं,
कुछ मेरे मित्रों, कुछ, मेरे देश को अर्पण हैं ||

ये मेरे सुख का राग, दुःख की रागिनी हैं,
ये मेरी हर जीत, हर हार की संगिनी हैं ||

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आज का नेता ( १८ साल पहले )


२४ जून, १९९६ || १२:४५

कल गलियों का जो चोर था, आज बन बैठा है नेता,
पहले तू करता था चोरी, अब डाका डाले तेरा बेटा ||

नेता बन तू देश जलाता, उस अग्नि में गोश्त पकाता,
वादे करके प्यार के, नफरत-ओ-हिंसा भड़काता ||

भूखा आदमी सड़कें बनता, तपती धूप में पसीना बहाता,
उन सड़कों पे तू शान से चलता, उनके मेहनत पर खूब उछलता ||

क्या हुआ वो वादा जो तुमने था किया?
क्या फाइलों के ढेर में दबा दिया?

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एक नया ज़ख्म


२१ – २२ जून, १९९६ || २३:४० – ००:१५

“आओ, आओ,” – उसने कहा,
“बड़े दिनों बाद कोई नया दिखाई पड़ा,
पुरानी मण्डली से तंग आ चुका था,
तुम आ गए हो तो मौज करेंगे” ||

“आओ, तुम्हे कुछ पुराने दोस्तों से मिलवाऊँ |
ये है एक बेवफा मुहब्बत, ये हैं खुदगर्ज़ दोस्त,
ये ढोंगी रिश्तेदार, और ये एक गद्दार,
ये है झूटी ममता, और ये लुप्त हो चुकी समता,
ये भूख, ये बेरोज़गारी, ये नफरत, बेबसी, और लाचारी,
ये हिंसा है, ये चिंता, और ये है ज़मीर की चिता,
ये मक्कारी, ये अपमान, और ये मेरा खोया सम्मान ||

मेरा परिचय?
मैं हूँ एक टूटा ह्रदय – और तुम?”

मैं?
मैं हूँ एक नया ज़ख्म
जिसका न है कोई मरहम ||

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सडकें


५ जून, १९९६ || २१:३० – २१:४०

सूनी सी सड़कों पर, भीड़ है इंसानों की,
कुछ, पहचाने चेहरों की, कुछ, खोयी पहचानो की ||

कुछ चलते हैं राहों पर, संजोये हुए हसीं सपने,
कुछ चलते इन राहों पर, लेकर टूटे दिल हैं अपने ||

कुछ के मन में आशा है, आने वाले उस कल की,
कुछ के मन में है निराशा, खोये हुए उस पल की ||

पर सडकें तो चलती हैं, चलती ही जाएँगी,
दोस्त हो, या कोई दुश्मन, मंजिल तक पहुंचायेंगी ||

कितनी साफदिल हैं सडकें, जिनका किसी से बैर नहीं,
कितना बेगैरत है इंसान, जो किसी का हमदर्द नहीं ||

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मुस्कराओ


२९ जनवरी, १९९६

ज़िन्दगी ग़मों की राह है,
हंसोगे, तभी चल पाओगे –
इस राह में फूल कम, कांटे हैं ज्यादा,
चल तभी सकोगे, जब मुस्कराओगे ||

मुश्किलें चाहे जितनी पड़ें, तुम हँसना ना छोड़ना,
तुम ना रहोगे हमेशा – ये सोच, जीना ना छोड़ना ||

दुःख मिलें चाहे जितने, तुम हंसी बांटते रहना,
हर चेहरा जो रोता मिले, उसे ख़ुशी बांटते रहना ||

हंसी में जो नशा है, मय में वो नशा कहाँ,
खुशियाँ लुटाने में जो मज़ा है, वो आंसू दिखाने में कहाँ ?

मुस्कराहट ज़िन्दगी है, जिसे किसी-किसी ने ही जाना,
हर शख्स जो मुस्कराएगा, उसे मंजिल को है पाना ||

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