अंजाम-ए-इश्क


एक ठंड की शाम, ना था जो कोई काम,
तो लेते उनका नाम, थे बैठे दिल को थाम ||

कि कुछ यार आये, बोले – “क्या हुआ मियां गुलफाम?
छोड़ो ये रोना धोना, लो चढाओ एक जाम!
मिलना-बिछड़ना, यही ज़िन्दगी है,
मौज करो – ना करो इसे गम के नाम”

हर इश्क की दास्ताँ का, है बस यही अंजाम,
बना देती है ये लायक्मंदो को नालायक, नाकारा, और नाकाम ||

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चंद पंक्तियाँ दिल पे, दिल से…


कक्षा १०, १९९३

तूने इस दिल के टुकड़े तो किये हज़ार,
पर ये मेरा दिल था जो तुझसे बेगाना न हुआ ||

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मेरी नज़र का असर, दिल पे होता हो अगर,
मुझसे तू दोस्ती कर ले, देना न दगा कभी मगर ||

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तेरे दिल की गहराईयों में उतरना आसन न था,
हमने सोचा चलो तेरी आँखों में ही बस जाएँ ||

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तेरे घर में आना तो आसान था लेकिन,
तेरे दिल में घर बनाने की गुंजाईश न थी ||

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दिल की कोई तमन्ना नहीं बची है,
जो तुम मिली हो, तो साड़ी ख़ुशी मिली है ||

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तेरे दिल में मेरे प्यार का निशाँ नहीं,
इस गम पे मेरे रोती खुदाई है,
हमसफ़र मिले तो कई मगर,
सभी ने की बेवफाई है ||

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इस दिल पर तुम्हारा अधिकार है,
तुम्हारी ही यादों का इसपर अख्तियार है,
दिल ही क्या, ये जान भी तुमपर निस्सार है,
इस जहाँ से ज्यादा, हमें तुमसे प्यार है ||

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दिल में सौ ज़ख्म लिए बैठे हैं,
फिर भी हम होंठ सिये बैठे हैं,
है आपकी, हाँ हाज़िर है दिल-औ-जान,
दोस्त फिर किस दिन के लिए बैठे हैं ||

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