अंजाम-ए-इश्क


एक ठंड की शाम, ना था जो कोई काम,
तो लेते उनका नाम, थे बैठे दिल को थाम ||

कि कुछ यार आये, बोले – “क्या हुआ मियां गुलफाम?
छोड़ो ये रोना धोना, लो चढाओ एक जाम!
मिलना-बिछड़ना, यही ज़िन्दगी है,
मौज करो – ना करो इसे गम के नाम”

हर इश्क की दास्ताँ का, है बस यही अंजाम,
बना देती है ये लायक्मंदो को नालायक, नाकारा, और नाकाम ||

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मुस्कराओ


२९ जनवरी, १९९६

ज़िन्दगी ग़मों की राह है,
हंसोगे, तभी चल पाओगे –
इस राह में फूल कम, कांटे हैं ज्यादा,
चल तभी सकोगे, जब मुस्कराओगे ||

मुश्किलें चाहे जितनी पड़ें, तुम हँसना ना छोड़ना,
तुम ना रहोगे हमेशा – ये सोच, जीना ना छोड़ना ||

दुःख मिलें चाहे जितने, तुम हंसी बांटते रहना,
हर चेहरा जो रोता मिले, उसे ख़ुशी बांटते रहना ||

हंसी में जो नशा है, मय में वो नशा कहाँ,
खुशियाँ लुटाने में जो मज़ा है, वो आंसू दिखाने में कहाँ ?

मुस्कराहट ज़िन्दगी है, जिसे किसी-किसी ने ही जाना,
हर शख्स जो मुस्कराएगा, उसे मंजिल को है पाना ||

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उनके नाम (An Ode To ‘She Walks In Beauty’)


२८ जनवरी, १९९६ || १६:३५ – १६:५७

आँखों में चमक है तारों की, अमावस्या से काले गेसू,
दिल करता है जीवन भर, अब तेरा चेहरा ही देखूं ||

लब लरजते गुलाब हैं जैसे, चन्दन सा महकता तेरा शबाब,
खुदा ने तुझे जो रूप दिया, कर देता है मुझे बेताब ||

काया तेरी कंचन है, मन है तेरा चंचल,
हंसती है तू, तो खिल उठता है, इस धरती का भी आँचल ||

चेहरा झलकाता है भावों को, हया पवित्रता की परछाईं है,
ऐसा लगता है एक जन्नत की हूर, बस मेरे लिए ही आई है ||

मोरनी जैसी चाल है तेरी, सुनकर क्यूँ शरमाई है?
किसी और जगह नहीं, इक इस मन में तू समायी है ||

केवल अच्छी बातें सुनती, बुरी पर ना देती ध्यान,
दूजों से सिर्फ मीठा बोले, ऐसी तेरी जुबां ||

रंगत तेरे रूप की, ना गोरी है ना काली,
दुनिया के मेले में बैठी, इक लड़की भोली भाली ||

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नया साल (Happy New Year)


३१ दिसम्बर १९९५  || १३:४० – १३:४५

गुज़रते साल की, आखिरी ये शाम है,
दिलों में सबके, यादों के जाम हैं –
कुछ खट्टी-ओ-कुछ मीठी यादें हैं,
कुछ निभाए-ओ-कुछ तोड़े हुए वादे हैं ||

नए साल के इंतज़ार में, बीत रहे ज़माने हैं,
साल नया है, अरमां वही पुराने हैं –
शमाओं की रोशन महफ़िल में,
जल रहे परवाने हैं ||

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तनहा नहीं मैं


३० अक्टूबर, १९९५

खिल गयी थी कल एक कली, जाने आज क्यों मुरझाई है –
तेरी यादों ने आज फिर, चिंगारी कोई जलाई है ||

तनहा नहीं मैं, साथ मेरे तन्हाई है,
ज़िन्दगी मैंने फिर, अकेले कहाँ बितायी है?

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…बदली नहीं


२९ अक्टूबर, १९९५

रास्ते बदल गए मगर, मंजिलें तो बदली नहीं,
तुम दूर हुए तो क्या,पहचान तुम्हारी बदली नहीं ||

जो साथ बनायीं थीं हमने, तस्वीरें वो बदली नहीं,
उन सुनहरे ख्वाबों की, ताबीर कभी बदली नहीं ||

तुमने न फिर पुकारा मुझे, आवाज़ तुम्हारी बदली नहीं,
पलट कर न देखा, – ना सही, निगाहों की मदहोशी बदली नहीं ||

तुम रूठे रहो सनम, हमारी मनाने की आदत बदली नहीं,
जिनपर तुम मरती थीं, वो अदाएं हमारी बदली नहीं ||

तुमने जफ़ा हमसे की, हमारी वफायें बदली नहीं,
तुमसे भी हसीं मिले मगर, चाहत हमारी बदली नहीं ||

कल जहाँ हम साथ थे, वो दुनिया अब भी बदली नहीं,
जो लम्हे साथ बिताये थे, उनकी यादें कभी बदली नहीं ||

दिन तो गुज़रते रहे मगर, रातों की हालत बदली नहीं,
जिन शामों को ढलते देखा था साथ, रंगत उनकी बदली नहीं ||

जिनके किनारे हम थे मिलते, वो लहरें अभी बदली नहीं,
तुझे हैं ढूंढती मेरी आँखें, इंतज़ार की आदत बदली नहीं ||

जहाँ तुम्हारी थी हुकूमत, वो अदालत अभी बदली नहीं,
वापस आजा दिल में ए-सनम, तेरी जगह अब तलक बदली नहीं ||

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