आज का नेता ( १८ साल पहले )


२४ जून, १९९६ || १२:४५

कल गलियों का जो चोर था, आज बन बैठा है नेता,
पहले तू करता था चोरी, अब डाका डाले तेरा बेटा ||

नेता बन तू देश जलाता, उस अग्नि में गोश्त पकाता,
वादे करके प्यार के, नफरत-ओ-हिंसा भड़काता ||

भूखा आदमी सड़कें बनता, तपती धूप में पसीना बहाता,
उन सड़कों पे तू शान से चलता, उनके मेहनत पर खूब उछलता ||

क्या हुआ वो वादा जो तुमने था किया?
क्या फाइलों के ढेर में दबा दिया?

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एक नया ज़ख्म


२१ – २२ जून, १९९६ || २३:४० – ००:१५

“आओ, आओ,” – उसने कहा,
“बड़े दिनों बाद कोई नया दिखाई पड़ा,
पुरानी मण्डली से तंग आ चुका था,
तुम आ गए हो तो मौज करेंगे” ||

“आओ, तुम्हे कुछ पुराने दोस्तों से मिलवाऊँ |
ये है एक बेवफा मुहब्बत, ये हैं खुदगर्ज़ दोस्त,
ये ढोंगी रिश्तेदार, और ये एक गद्दार,
ये है झूटी ममता, और ये लुप्त हो चुकी समता,
ये भूख, ये बेरोज़गारी, ये नफरत, बेबसी, और लाचारी,
ये हिंसा है, ये चिंता, और ये है ज़मीर की चिता,
ये मक्कारी, ये अपमान, और ये मेरा खोया सम्मान ||

मेरा परिचय?
मैं हूँ एक टूटा ह्रदय – और तुम?”

मैं?
मैं हूँ एक नया ज़ख्म
जिसका न है कोई मरहम ||

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सडकें


५ जून, १९९६ || २१:३० – २१:४०

सूनी सी सड़कों पर, भीड़ है इंसानों की,
कुछ, पहचाने चेहरों की, कुछ, खोयी पहचानो की ||

कुछ चलते हैं राहों पर, संजोये हुए हसीं सपने,
कुछ चलते इन राहों पर, लेकर टूटे दिल हैं अपने ||

कुछ के मन में आशा है, आने वाले उस कल की,
कुछ के मन में है निराशा, खोये हुए उस पल की ||

पर सडकें तो चलती हैं, चलती ही जाएँगी,
दोस्त हो, या कोई दुश्मन, मंजिल तक पहुंचायेंगी ||

कितनी साफदिल हैं सडकें, जिनका किसी से बैर नहीं,
कितना बेगैरत है इंसान, जो किसी का हमदर्द नहीं ||

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उनके नाम (An Ode To ‘She Walks In Beauty’)


२८ जनवरी, १९९६ || १६:३५ – १६:५७

आँखों में चमक है तारों की, अमावस्या से काले गेसू,
दिल करता है जीवन भर, अब तेरा चेहरा ही देखूं ||

लब लरजते गुलाब हैं जैसे, चन्दन सा महकता तेरा शबाब,
खुदा ने तुझे जो रूप दिया, कर देता है मुझे बेताब ||

काया तेरी कंचन है, मन है तेरा चंचल,
हंसती है तू, तो खिल उठता है, इस धरती का भी आँचल ||

चेहरा झलकाता है भावों को, हया पवित्रता की परछाईं है,
ऐसा लगता है एक जन्नत की हूर, बस मेरे लिए ही आई है ||

मोरनी जैसी चाल है तेरी, सुनकर क्यूँ शरमाई है?
किसी और जगह नहीं, इक इस मन में तू समायी है ||

केवल अच्छी बातें सुनती, बुरी पर ना देती ध्यान,
दूजों से सिर्फ मीठा बोले, ऐसी तेरी जुबां ||

रंगत तेरे रूप की, ना गोरी है ना काली,
दुनिया के मेले में बैठी, इक लड़की भोली भाली ||

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वो और मैं ( नारी के रूप )


१३ नवम्बर, १९९५  || १०:२८ – ११:३३

पहला  रूप ||

सूख गया है एक और पौधा,  मुरझाई है एक और कली –
जननी कल वो तेरी थी, आज है चढ़ाई जिसकी तूने बली ||

ज़माना है बदल गया,  विचारों को तुम अपने बदलो,
जिसने तुम्हें जन्म दिया – उसके महत्व को समझो ||

मैं तुम्हारी माँ नहीं, उस नारी की बात करता हूँ –
तुम जिसे रोंदते हो – मैं जिसकी पूजा करता हूँ ||

समझ नहीं है आती मेरे, आज तक तुम्हारी ये नीति –
माँ के चरण हो छूते, गला दबाते उसका जो स्वयं तुम्हारी है बेटी ?

एक माँ तुम्हारी है, एक माँ होगी तुम्हारी बेटी |
उसकी इच्छाएं हो दबाते, उसे पढना, लिखना नहीं सिखाते,
फिर अपनी माता के प्रती, कैसे हो इतनी इज्ज़त दर्शाते ?

माँ से जो प्रेम हो करते, बेटी को भी बढ़ने दो,
कल तुम्हारा मान बढ़ाये, उसे इतना ऊंचा उठने दो ||

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दूसरा रूप ||

ऐसे राक्षस भी हैं यहाँ, जो नारी की इज्ज़त उछालते हैं –
एक बेहें की आबरू हैं लूटते, दूजी पे जान लुटाते हैं ||

मैं, आप, हम सब, फिर भी चुप हैं, कोई आवाज़ न उठाते हैं, –
इन्हें सजा न देकर, इनका साथ निभाते हैं ||

इनका साथ देने से, मैं मरना बेहतर समझूंगा,
बचा पाया किसी की इज्ज़त, अपने को खुशकिस्मत समझूंगा ||

आपमें कुछ ऐसे हैं, जो मेरा साथ निभाएंगे –
बेटी, बेटे समान हैं, ये साबित कर दिखलायेंगे ||

नारी समाज की जननी है, उसका सम्मान बढ़ाएंगे –
नर-नारी मिलकर ही, प्रगति-पथ पर कदम बढ़ाएंगे ||

~

तीसरा रूप ||

दहेज़ की वेदी पर हैं जो जलती, उन बहुओं को आज बचाना है ||

माता-पिता को अपने, हम सबको ये समझाना है –
की तुम्हारी भी एक बेटी है, जिसे सास के पास जाना है,
आज तुम उनकी बेटी जलाते हो – कल तुम्हारी को जल जाना है ||

केवल पैसे की खातिर, आत्मा पे क्यूँ धब्बा लगते हो ?
तुन्हारी बहू तुम्हारी बेटी है, अपनी बेटी को क्यूँ जलाते हो ?

पैसे तो भाग्य है – आता है, और जाता है –
बहू है लक्ष्मी का रूप – एक बार ही आता है ||

मिटा दो ऐसी प्रथा को, बहुओं से करो तुम प्यार,
इससे बढ़कर सुख कहाँ, कि घर हो प्रेम भंडार ||

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अंततः

बेटियों को पढाओ-लिखाओ, बहनों की करो रखवाली,
दहेज़ नहीं, बहू मांगो – तभी आएगी खुशहाली ||

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वो और मैं (… एक प्रेम गाथा )


१३ नवम्बर, १९९५  || ००:२५ – १:२५

था छोटा ही मगर, दिल में थिस दिलेरी समायी,
जो बात दिल में थी, वो उसे जा बताई ||

पहले तो वो घबडाई, मैंने देखा की वो थी कुछ शरमाई,
अपनी मदहोश नज़रों से मुझे देखा, पूछा – “ये बात पहले क्यूँ नहीं बताई?”
मैं तो शोर्ट-टर्म सोच रहा था, उसने शादी में रूचि दिखलाई ||

मैंने सोचा की वाह, किस्मत ने क्या पलती है खायी –
एक पौधा सूख रहा था, उसपर एक नयी पत्ती दी दिखाई ||
मुझे वापस आना था, उसने रोते हुए दी विदाई |

वापस आकर मैंने किस्मत को दिया एक और try –
उसे फ़ोन किया | उसकी माँ ने उठाया –
मुझे डांट लगायी ||

मैं घबडाया – सब गड़बड़ हो गयी भाई !
मैं वापस भागा – एक दोस्त के घर पहुंचकर ही ब्रेक लगायी ||
उसने कहा “मेरे भाई !” मैं बोला “दुहाई है दुहाई !”

वो समझ गया | बोला –
“दोस्त, तू उसे भूल जा, हो चुकी है अब वो पराई,-
छोड़ दे ये सब चक्कर, मन लगा, और कर पढाई ||”

दिल ऐसा जला मेरा, मानो किसी ने हो आग लगाई |
दिन आये, दिन बीते, रातों को मुझे नींद ना आई –
यादें उसकी ऐसी थीं, जैसे हों खुद मेरी परछाईं ||

सब घूमने जा रहे थे | मैंने भी अर्जी लगाई |
पापा से परमिशन मांगी, उन्होंने भी स्वीकृति दिखलाई ||
पर किस्मत मेरी ख़राब थी – इश्वर ने अटकलें लगायीं |

पहले तो जाने के दो दिन पूर्व, मेरे मेअस्लेस निकल आई,
दूजे ये खबर की मैं भी जाऊँगा, किसी ने उसकी माँ को जा बताई ||
क्या मैं कोई भूत हूँ जो वो इस तरह घबडाई?
प्रिंसिपल ने मुझे रोक दिया, मेरे सारे प्लान्स हो गए धाराशायी ||

मैंने भी अपने बाल नोच खाए | कोई भी यही करता, वड़ी साईं ||

फिर भी मैं डटा रहा – अपनी हिम्मत न गंवाई –
देवदास की तरह जाम में, अपनी जवानी न बहाई ||
कहाँ पढ़ती है, कहाँ रहती है, गुप्तचरों से खबर लगवाई –
वहां के पते पर, चिट्ठियां भिजवाई ||

वो मेरे दर पर आई, अपनी नाज़ुक उँगलियों से घंटी बजायी |
मैं बाहर आया | वो मुझे देख मुस्काई,
मेरे पास बैठी, मुझसे घंटों बतायाई ||

उफ्फ|
तभी किसी ने चिकोटी काटी – नींद मेरी भगाई |
सपना था ये मेरा, हाय, ना थी ये सच्चाई ||

कोशिश तो की बहुत, पर सफलता ना मैंने पायी –
यादों में वो बस गयी, मेरे दिल से ना निकल पायी ||
नहीं चाहता की हो ज़माने में उसकी रुसवाई,
घर-घर का किस्सा हो, उसका किस्सा-ए-बेवफाई ||

कचोट रहे हैं आज मुझे, मेरा अकेलापन-औ-मेरी तन्हाई,
आज किसी बेवफा की, मुझे फिर है याद आई ||

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वो और मैं ( पेड़ की आत्मकथा )


१२ नवम्बर, १९९५  || १२:०७ – १२:१३ 

दूर-दूर तक बंजर धरती,
मेरा कहीं निशाँ नहीं |
ईंट-पत्थर की छाँव में,
मेरी कहीं पहचान नहीं ||

मैं,
जिसने तुझे जीवन दिया,
तूने उसे मिटा दिया?

तू मेरा बेटा था,
मेरी छाँव में थककर लेटा था,
ठन्डे हिंडोलों के आँचल में,
मैंने तुझे सुलाया था;
तू भूखा था,
तुझे भोजन कराया था,
तुझे ठण्ड लग रही थी,
स्वयं कट कर, तुझे तपाया था …

आज इस पिता पर ये उपकार कर,
मुझे काट मत, और एक एहसान कर,
अपने आँगन में मुझे लगा,
अपनी बगिया को हरा-भरा कर –
इस संसार को महका,
मुझपर पुष्प उगा कर ||

जो मैं ना रहूँगा,
तो तू भी ना रहेगा –
स्वयं को बचा –
मुझे पालकर ||

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