उनके नाम (An Ode To ‘She Walks In Beauty’)


२८ जनवरी, १९९६ || १६:३५ – १६:५७

आँखों में चमक है तारों की, अमावस्या से काले गेसू,
दिल करता है जीवन भर, अब तेरा चेहरा ही देखूं ||

लब लरजते गुलाब हैं जैसे, चन्दन सा महकता तेरा शबाब,
खुदा ने तुझे जो रूप दिया, कर देता है मुझे बेताब ||

काया तेरी कंचन है, मन है तेरा चंचल,
हंसती है तू, तो खिल उठता है, इस धरती का भी आँचल ||

चेहरा झलकाता है भावों को, हया पवित्रता की परछाईं है,
ऐसा लगता है एक जन्नत की हूर, बस मेरे लिए ही आई है ||

मोरनी जैसी चाल है तेरी, सुनकर क्यूँ शरमाई है?
किसी और जगह नहीं, इक इस मन में तू समायी है ||

केवल अच्छी बातें सुनती, बुरी पर ना देती ध्यान,
दूजों से सिर्फ मीठा बोले, ऐसी तेरी जुबां ||

रंगत तेरे रूप की, ना गोरी है ना काली,
दुनिया के मेले में बैठी, इक लड़की भोली भाली ||

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नया साल (Happy New Year)


३१ दिसम्बर १९९५  || १३:४० – १३:४५

गुज़रते साल की, आखिरी ये शाम है,
दिलों में सबके, यादों के जाम हैं –
कुछ खट्टी-ओ-कुछ मीठी यादें हैं,
कुछ निभाए-ओ-कुछ तोड़े हुए वादे हैं ||

नए साल के इंतज़ार में, बीत रहे ज़माने हैं,
साल नया है, अरमां वही पुराने हैं –
शमाओं की रोशन महफ़िल में,
जल रहे परवाने हैं ||

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तनहा नहीं मैं


३० अक्टूबर, १९९५

खिल गयी थी कल एक कली, जाने आज क्यों मुरझाई है –
तेरी यादों ने आज फिर, चिंगारी कोई जलाई है ||

तनहा नहीं मैं, साथ मेरे तन्हाई है,
ज़िन्दगी मैंने फिर, अकेले कहाँ बितायी है?

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…बदली नहीं


२९ अक्टूबर, १९९५

रास्ते बदल गए मगर, मंजिलें तो बदली नहीं,
तुम दूर हुए तो क्या,पहचान तुम्हारी बदली नहीं ||

जो साथ बनायीं थीं हमने, तस्वीरें वो बदली नहीं,
उन सुनहरे ख्वाबों की, ताबीर कभी बदली नहीं ||

तुमने न फिर पुकारा मुझे, आवाज़ तुम्हारी बदली नहीं,
पलट कर न देखा, – ना सही, निगाहों की मदहोशी बदली नहीं ||

तुम रूठे रहो सनम, हमारी मनाने की आदत बदली नहीं,
जिनपर तुम मरती थीं, वो अदाएं हमारी बदली नहीं ||

तुमने जफ़ा हमसे की, हमारी वफायें बदली नहीं,
तुमसे भी हसीं मिले मगर, चाहत हमारी बदली नहीं ||

कल जहाँ हम साथ थे, वो दुनिया अब भी बदली नहीं,
जो लम्हे साथ बिताये थे, उनकी यादें कभी बदली नहीं ||

दिन तो गुज़रते रहे मगर, रातों की हालत बदली नहीं,
जिन शामों को ढलते देखा था साथ, रंगत उनकी बदली नहीं ||

जिनके किनारे हम थे मिलते, वो लहरें अभी बदली नहीं,
तुझे हैं ढूंढती मेरी आँखें, इंतज़ार की आदत बदली नहीं ||

जहाँ तुम्हारी थी हुकूमत, वो अदालत अभी बदली नहीं,
वापस आजा दिल में ए-सनम, तेरी जगह अब तलक बदली नहीं ||

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परिवर्तन लाओ…


९ जनवरी, १९९६

जब हुआ न था ये बंटवारा,
गुलिस्तान महकता था सारा,
अंग्रेजों ने आके आग लगायी,
दिलों में हमारे नफरत जगाई –
भाई रहे न भाई –
हो गयी सारी प्रीत परायी ||

जो शीर्ष झुकाते थे कभी सजदे में,
जो हाथ थे थाम लेते गिर पड़ने पे,
वही अब हैं शीर्ष काट रहे,
वही हाथ हैं अब गिरा रहे –
टूट गए सब रिश्ते,
ख़त्म हुए सब किस्से ||

हे प्रभु (मानव) आज इस धरती पर,
तुम ऐसा चमत्कार दिखलाओ,
जो मुरझाएं ना कभी,
कुछ ऐसे फूल खिलाओ –
भेद भाव मिटाओ |

बुझ ना पाएं कभी जो,
दिलों में ऐसे दीप जलाओ,
लुप्त हो चुकी है जो एकता,
मन में उसके बीज उपजाओ –
सब जन आओ ||
मिट सके ना दूजों से,
ऐसी प्रीत, प्रेम बढ़ाओ ||

हे प्रभु (मानव) आज इस धरती पर,
ऐसी शक्ति का संचार करो,
मिटे वैमनस्य का भाव,
घृणा का भी उपचार करो –
जन जन के मन में अब,
अमित प्रेम संचार करो |
सन्देश ये फैलाओ –
टूटेगी ना अब ये एकता,
हर दिल में ये विश्वास जगाओ ||

दिलों में नफरत की आग लगी है –
बंधुत्व के जल से इसे बुझाओ |
मंदिर नहीं, मस्जिद नहीं –
इश्वर भक्ति के भवन बनाओ |
दूरियां मिटाओ –
मिलकर गा सकें सब ऐसा,
एक सुर का गीत बनाओ ||

ऐसा न हो कोई दुश्मन,
फिर से आग लगा जाये –
गर इससे बचना हो,
तो देश से जात-पात हटाओ ||

आओ, इस धरती पर आकर,
मिलकर अपना शीर्ष नावों,
कसम ये खाओ –
मुस्लिम, हिन्दू, सिख्खों, ईसाईयों को,
फिर से भाई-बंधू बनाओ,
सौहार्द बढ़ाओ – परिवर्तन लाओ ||

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साथ दे सको, तो आओ


८ जनवरी, १९९६  || ००:१० – ००:४८

प्यार की प्यास है मुझे, भूख दौलत की नहीं,
साथ दे सको, तो आओ, घर मेरा है वहीँ
जहाँ सिक्कों की गूँज नहीं, शान्ति की शहनाई है,
कोई मज़हब नहीं, कोई धर्म नहीं, ना कोई प्रीत पराई है ||

बंधुत्व यहाँ का नारा है, एकता ने आवाज़ उठाई है,
हिन्दू, मुस्लिम,सिख ईसाई, सभी तो मेरे भाई हैं ||

हिन्दू इश्वर को याद करे, इमाम ने अज़ान सुनाई है,
राम कहो, या कहो अल्लाह, भक्ति दोनों में समायी है ||

दूर करो उस राक्षस को, जिसने इर्ष्या की आग भड़काई है –
बड़े सब्र-औ-बड़ी मेहनत से, मैंने ये दुनिया सजाई है ||

हो हौसला, तो आओ साथ, मिलकर इस बगिया को सींचो,
दिलों को जो एक दूजे से जोड़े, ऐसा प्रेम का दरिया खींचो ||

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कश्मीर


१५  नवम्बर, १९९५  ||  ‘अजनबी’ सीरियल देखने के बाद

प्यारा कश्मीर, न्यारा कश्मीर,
हर भारतीय का दुलारा, कश्मीर ||
धरती का स्वर्ग,
भारत का शीर्ष, कश्मीर ||

ठंडी जिसकी है समीर,
जहाँ बहता दल का नीर,
हिमाला की गोद में,
प्रकृति का बेटा, कश्मीर ||

भारत का अंग है,
उसका सितारा है कश्मीर,
झीलों के हृदय पर बसा,
एक शिकारा है कश्मीर ||

सेब जहाँ के होते मीठे,
वो हमारा बाग-ए-कश्मीर,
हमें-तुम्हें जो है बांधती,
वो एकता की पताका – कश्मीर ||

पर,
आज कश्मीर की शान्ति भंग है,
आतंकवाद से कश्मीरी तंग हैं |
टूटे-फूटे शिकारे,
हैं आज यहाँ के नज़ारे,
सुनाई देती हर तरफ,
हैं केवल चीख-पुकारें ||

दोस्तों, देखो कश्मीर को
हमने क्या से क्या बना डाला,
स्वर्ग जो कहलाता था हमारा,
उसे दोज़ख का हमशक्ल बना डाला ||

करो ना छलनी सीना इसका,
सीमाओं तक हमारा है कश्मीर –
हिंसा छोडो, प्यार बढ़ाओ,
लाशों नहीं – फूलों से इसे सजाओ ||

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