एक नया ज़ख्म


२१ – २२ जून, १९९६ || २३:४० – ००:१५

“आओ, आओ,” – उसने कहा,
“बड़े दिनों बाद कोई नया दिखाई पड़ा,
पुरानी मण्डली से तंग आ चुका था,
तुम आ गए हो तो मौज करेंगे” ||

“आओ, तुम्हे कुछ पुराने दोस्तों से मिलवाऊँ |
ये है एक बेवफा मुहब्बत, ये हैं खुदगर्ज़ दोस्त,
ये ढोंगी रिश्तेदार, और ये एक गद्दार,
ये है झूटी ममता, और ये लुप्त हो चुकी समता,
ये भूख, ये बेरोज़गारी, ये नफरत, बेबसी, और लाचारी,
ये हिंसा है, ये चिंता, और ये है ज़मीर की चिता,
ये मक्कारी, ये अपमान, और ये मेरा खोया सम्मान ||

मेरा परिचय?
मैं हूँ एक टूटा ह्रदय – और तुम?”

मैं?
मैं हूँ एक नया ज़ख्म
जिसका न है कोई मरहम ||

~o~

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