सडकें


५ जून, १९९६ || २१:३० – २१:४०

सूनी सी सड़कों पर, भीड़ है इंसानों की,
कुछ, पहचाने चेहरों की, कुछ, खोयी पहचानो की ||

कुछ चलते हैं राहों पर, संजोये हुए हसीं सपने,
कुछ चलते इन राहों पर, लेकर टूटे दिल हैं अपने ||

कुछ के मन में आशा है, आने वाले उस कल की,
कुछ के मन में है निराशा, खोये हुए उस पल की ||

पर सडकें तो चलती हैं, चलती ही जाएँगी,
दोस्त हो, या कोई दुश्मन, मंजिल तक पहुंचायेंगी ||

कितनी साफदिल हैं सडकें, जिनका किसी से बैर नहीं,
कितना बेगैरत है इंसान, जो किसी का हमदर्द नहीं ||

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