मुस्कराओ


२९ जनवरी, १९९६

ज़िन्दगी ग़मों की राह है,
हंसोगे, तभी चल पाओगे –
इस राह में फूल कम, कांटे हैं ज्यादा,
चल तभी सकोगे, जब मुस्कराओगे ||

मुश्किलें चाहे जितनी पड़ें, तुम हँसना ना छोड़ना,
तुम ना रहोगे हमेशा – ये सोच, जीना ना छोड़ना ||

दुःख मिलें चाहे जितने, तुम हंसी बांटते रहना,
हर चेहरा जो रोता मिले, उसे ख़ुशी बांटते रहना ||

हंसी में जो नशा है, मय में वो नशा कहाँ,
खुशियाँ लुटाने में जो मज़ा है, वो आंसू दिखाने में कहाँ ?

मुस्कराहट ज़िन्दगी है, जिसे किसी-किसी ने ही जाना,
हर शख्स जो मुस्कराएगा, उसे मंजिल को है पाना ||

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वो और मैं ( पेड़ की आत्मकथा )


१२ नवम्बर, १९९५  || १२:०७ – १२:१३ 

दूर-दूर तक बंजर धरती,
मेरा कहीं निशाँ नहीं |
ईंट-पत्थर की छाँव में,
मेरी कहीं पहचान नहीं ||

मैं,
जिसने तुझे जीवन दिया,
तूने उसे मिटा दिया?

तू मेरा बेटा था,
मेरी छाँव में थककर लेटा था,
ठन्डे हिंडोलों के आँचल में,
मैंने तुझे सुलाया था;
तू भूखा था,
तुझे भोजन कराया था,
तुझे ठण्ड लग रही थी,
स्वयं कट कर, तुझे तपाया था …

आज इस पिता पर ये उपकार कर,
मुझे काट मत, और एक एहसान कर,
अपने आँगन में मुझे लगा,
अपनी बगिया को हरा-भरा कर –
इस संसार को महका,
मुझपर पुष्प उगा कर ||

जो मैं ना रहूँगा,
तो तू भी ना रहेगा –
स्वयं को बचा –
मुझे पालकर ||

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वो और मैं (.. एक बीज)


१० नवम्बर, १९९५  || १२:३०  – १३:००

एक छोटा सा बीज था –
पर वाह, क्या चीज़ था ||

मैंने उसे पड़ा पाया – उठाया,
और एक उर्वर भूमि में लगाया ||
वो सूख रहा था, उसे पानी पिलाया,
कोई रोंद न जाए – एक लकड़ी का पिंजर लगाया ||

जब वो कुछ बड़ा हुआ,
अपने दुःख-दर्द से अवगत कराया ||
वो खड़ा रहा, मुस्काया,
मुझे ज़िन्दगी का मतलब समझाया –
की रातें तो आती हैं,
सूरज भी फिर से निकलता है,
जो तूफानों से लड़ जाए –
आगे बस वही निकलता है ||

समय गुजरता रहा | वो भी बढ़ता रहा ||

वो अकेला था|
उसके दोस्त केवल आंधी-औ-तूफ़ान थे|
पर वो आसमान चूने को चढ़ता रहा ||
सावन गुजरे, पतझड़ आई, –
पर वो डटा रहा|
मुझे फल, फूल, और छाया देता रहा||
मेरे गम सुनता रहा,
मुझे सहारा देता रहा ||

फिर वो दिन आया|

उस शाम के धुंधलके में,
परछाईं किसी की निकली,
उसके हाथ ऊपर उठे,
और हाथों में एक कुल्हाडी चमकी |

वो तब भी न चीख सका –
उसकी कराहट केवल मेरे कानो तक पहुंची –
पर जब तक मैं वहां पहुंचा,
उसकी शीतल छाया ना थी बची ||

हर पेड़ की आज यही कहानी है,
और बात है ये बिलकुल पक्की,
गर हम ना रुके, तो खबर आएगी –
भैया, मानवता नहीं है बची ||

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