सडकें


५ जून, १९९६ || २१:३० – २१:४०

सूनी सी सड़कों पर, भीड़ है इंसानों की,
कुछ, पहचाने चेहरों की, कुछ, खोयी पहचानो की ||

कुछ चलते हैं राहों पर, संजोये हुए हसीं सपने,
कुछ चलते इन राहों पर, लेकर टूटे दिल हैं अपने ||

कुछ के मन में आशा है, आने वाले उस कल की,
कुछ के मन में है निराशा, खोये हुए उस पल की ||

पर सडकें तो चलती हैं, चलती ही जाएँगी,
दोस्त हो, या कोई दुश्मन, मंजिल तक पहुंचायेंगी ||

कितनी साफदिल हैं सडकें, जिनका किसी से बैर नहीं,
कितना बेगैरत है इंसान, जो किसी का हमदर्द नहीं ||

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वो और मैं (..एक खोया बचपन, एक बहकी जवानी)


१० नवम्बर, १९९५  || १४:१३ – १४:४५

वो बहुत छोटा था |
किस्मत का भी खोटा था ||
बाप का पता नहीं,
माँ, मंदिर के सामने छोड़ गयी थी ||

उसकी कोई गलती ना थी,
फिर भी उसने खुदको अकेला पाया |
ना वो ज़माने को,
ना ज़माना उसे भाया ||

कूड़े के ढेर में,
कीचड की सेज पे,
उसने अपना भोला-भाला,
मासूम सा बचपन बिताया ||

दिन में सोता रहा,
रातों को जाग पैसा कमाया –
उसकी जवानी ने शहर में
उसकी दादागिरी का सिक्का जमाया ||

शरीफों की दुनिया में गुंडा-औ-बदमाश,
दोस्तों की महफ़िल में, उनका बेताज बादशाह कहलाया ||

जब सहारा उसे देनो को,
मैंने अपना हाथ बढ़ाया,
तो बजे उसे थामने के,
उसने मुझे चाक़ू दिखलाया!

उसने कहा,
” तुम कहाँ थे जब मैं छोटा था?
पल-पल किसी के प्यार को रोता था?
सात साल की उम्र में गाड़ियां धोता –
सर्दियों में फुटपाथ पे सोता था?
तब तुम ना आये, क्यूंकि मैं मजबूर था,
हमउम्र बच्चों से, हर ख़ुशी से, दूर था!

आज मैं एक बुरे नाम का हूँ,
शायद, हाँ,
शायद तभी तुम्हारे काम का हूँ,
तुम मुझे सुधारोगे –
ज़माने को दिखाओगे,
उनके वोट कमाओगे,
और कुर्सी पे अपना मोर्चा जमाओगे ||
पर,
तुम मेरा खोया बचपन,
कैसे लौटा पाओगे?
मेरी माँ जो मुझे छोड़ गयी थी,
क्या तुम उसे ढूंढ पाओगे? ”

मैं स्तब्ध, निश्शब्द खड़ा रहा | कहने को कोई शब्द ना था ||

उसकी बातों में दर्द था | सच्चाई थी ||
इस जालिम ज़माने की, निर्लज्ज बेहयाई थी ||

छोडो इस ढोंग को,
शराफत का नकाब हटाओ |
भविष्य देश का सवारना है,
तो मासूमों को सहारा दो, उन्हें पढाओ ||

उनके अंधियारे जीवन में, एक नया सवेरा लाओ,
तब तुम गर्व से, अपने शीर्ष उठाओ ||

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