अंजाम-ए-इश्क


एक ठंड की शाम, ना था जो कोई काम,
तो लेते उनका नाम, थे बैठे दिल को थाम ||

कि कुछ यार आये, बोले – “क्या हुआ मियां गुलफाम?
छोड़ो ये रोना धोना, लो चढाओ एक जाम!
मिलना-बिछड़ना, यही ज़िन्दगी है,
मौज करो – ना करो इसे गम के नाम”

हर इश्क की दास्ताँ का, है बस यही अंजाम,
बना देती है ये लायक्मंदो को नालायक, नाकारा, और नाकाम ||

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उनके नाम (An Ode To ‘She Walks In Beauty’)


२८ जनवरी, १९९६ || १६:३५ – १६:५७

आँखों में चमक है तारों की, अमावस्या से काले गेसू,
दिल करता है जीवन भर, अब तेरा चेहरा ही देखूं ||

लब लरजते गुलाब हैं जैसे, चन्दन सा महकता तेरा शबाब,
खुदा ने तुझे जो रूप दिया, कर देता है मुझे बेताब ||

काया तेरी कंचन है, मन है तेरा चंचल,
हंसती है तू, तो खिल उठता है, इस धरती का भी आँचल ||

चेहरा झलकाता है भावों को, हया पवित्रता की परछाईं है,
ऐसा लगता है एक जन्नत की हूर, बस मेरे लिए ही आई है ||

मोरनी जैसी चाल है तेरी, सुनकर क्यूँ शरमाई है?
किसी और जगह नहीं, इक इस मन में तू समायी है ||

केवल अच्छी बातें सुनती, बुरी पर ना देती ध्यान,
दूजों से सिर्फ मीठा बोले, ऐसी तेरी जुबां ||

रंगत तेरे रूप की, ना गोरी है ना काली,
दुनिया के मेले में बैठी, इक लड़की भोली भाली ||

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तनहा नहीं मैं


३० अक्टूबर, १९९५

खिल गयी थी कल एक कली, जाने आज क्यों मुरझाई है –
तेरी यादों ने आज फिर, चिंगारी कोई जलाई है ||

तनहा नहीं मैं, साथ मेरे तन्हाई है,
ज़िन्दगी मैंने फिर, अकेले कहाँ बितायी है?

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…बदली नहीं


२९ अक्टूबर, १९९५

रास्ते बदल गए मगर, मंजिलें तो बदली नहीं,
तुम दूर हुए तो क्या,पहचान तुम्हारी बदली नहीं ||

जो साथ बनायीं थीं हमने, तस्वीरें वो बदली नहीं,
उन सुनहरे ख्वाबों की, ताबीर कभी बदली नहीं ||

तुमने न फिर पुकारा मुझे, आवाज़ तुम्हारी बदली नहीं,
पलट कर न देखा, – ना सही, निगाहों की मदहोशी बदली नहीं ||

तुम रूठे रहो सनम, हमारी मनाने की आदत बदली नहीं,
जिनपर तुम मरती थीं, वो अदाएं हमारी बदली नहीं ||

तुमने जफ़ा हमसे की, हमारी वफायें बदली नहीं,
तुमसे भी हसीं मिले मगर, चाहत हमारी बदली नहीं ||

कल जहाँ हम साथ थे, वो दुनिया अब भी बदली नहीं,
जो लम्हे साथ बिताये थे, उनकी यादें कभी बदली नहीं ||

दिन तो गुज़रते रहे मगर, रातों की हालत बदली नहीं,
जिन शामों को ढलते देखा था साथ, रंगत उनकी बदली नहीं ||

जिनके किनारे हम थे मिलते, वो लहरें अभी बदली नहीं,
तुझे हैं ढूंढती मेरी आँखें, इंतज़ार की आदत बदली नहीं ||

जहाँ तुम्हारी थी हुकूमत, वो अदालत अभी बदली नहीं,
वापस आजा दिल में ए-सनम, तेरी जगह अब तलक बदली नहीं ||

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साथ दे सको, तो आओ


८ जनवरी, १९९६  || ००:१० – ००:४८

प्यार की प्यास है मुझे, भूख दौलत की नहीं,
साथ दे सको, तो आओ, घर मेरा है वहीँ
जहाँ सिक्कों की गूँज नहीं, शान्ति की शहनाई है,
कोई मज़हब नहीं, कोई धर्म नहीं, ना कोई प्रीत पराई है ||

बंधुत्व यहाँ का नारा है, एकता ने आवाज़ उठाई है,
हिन्दू, मुस्लिम,सिख ईसाई, सभी तो मेरे भाई हैं ||

हिन्दू इश्वर को याद करे, इमाम ने अज़ान सुनाई है,
राम कहो, या कहो अल्लाह, भक्ति दोनों में समायी है ||

दूर करो उस राक्षस को, जिसने इर्ष्या की आग भड़काई है –
बड़े सब्र-औ-बड़ी मेहनत से, मैंने ये दुनिया सजाई है ||

हो हौसला, तो आओ साथ, मिलकर इस बगिया को सींचो,
दिलों को जो एक दूजे से जोड़े, ऐसा प्रेम का दरिया खींचो ||

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वो और मैं (… एक प्रेम गाथा )


१३ नवम्बर, १९९५  || ००:२५ – १:२५

था छोटा ही मगर, दिल में थिस दिलेरी समायी,
जो बात दिल में थी, वो उसे जा बताई ||

पहले तो वो घबडाई, मैंने देखा की वो थी कुछ शरमाई,
अपनी मदहोश नज़रों से मुझे देखा, पूछा – “ये बात पहले क्यूँ नहीं बताई?”
मैं तो शोर्ट-टर्म सोच रहा था, उसने शादी में रूचि दिखलाई ||

मैंने सोचा की वाह, किस्मत ने क्या पलती है खायी –
एक पौधा सूख रहा था, उसपर एक नयी पत्ती दी दिखाई ||
मुझे वापस आना था, उसने रोते हुए दी विदाई |

वापस आकर मैंने किस्मत को दिया एक और try –
उसे फ़ोन किया | उसकी माँ ने उठाया –
मुझे डांट लगायी ||

मैं घबडाया – सब गड़बड़ हो गयी भाई !
मैं वापस भागा – एक दोस्त के घर पहुंचकर ही ब्रेक लगायी ||
उसने कहा “मेरे भाई !” मैं बोला “दुहाई है दुहाई !”

वो समझ गया | बोला –
“दोस्त, तू उसे भूल जा, हो चुकी है अब वो पराई,-
छोड़ दे ये सब चक्कर, मन लगा, और कर पढाई ||”

दिल ऐसा जला मेरा, मानो किसी ने हो आग लगाई |
दिन आये, दिन बीते, रातों को मुझे नींद ना आई –
यादें उसकी ऐसी थीं, जैसे हों खुद मेरी परछाईं ||

सब घूमने जा रहे थे | मैंने भी अर्जी लगाई |
पापा से परमिशन मांगी, उन्होंने भी स्वीकृति दिखलाई ||
पर किस्मत मेरी ख़राब थी – इश्वर ने अटकलें लगायीं |

पहले तो जाने के दो दिन पूर्व, मेरे मेअस्लेस निकल आई,
दूजे ये खबर की मैं भी जाऊँगा, किसी ने उसकी माँ को जा बताई ||
क्या मैं कोई भूत हूँ जो वो इस तरह घबडाई?
प्रिंसिपल ने मुझे रोक दिया, मेरे सारे प्लान्स हो गए धाराशायी ||

मैंने भी अपने बाल नोच खाए | कोई भी यही करता, वड़ी साईं ||

फिर भी मैं डटा रहा – अपनी हिम्मत न गंवाई –
देवदास की तरह जाम में, अपनी जवानी न बहाई ||
कहाँ पढ़ती है, कहाँ रहती है, गुप्तचरों से खबर लगवाई –
वहां के पते पर, चिट्ठियां भिजवाई ||

वो मेरे दर पर आई, अपनी नाज़ुक उँगलियों से घंटी बजायी |
मैं बाहर आया | वो मुझे देख मुस्काई,
मेरे पास बैठी, मुझसे घंटों बतायाई ||

उफ्फ|
तभी किसी ने चिकोटी काटी – नींद मेरी भगाई |
सपना था ये मेरा, हाय, ना थी ये सच्चाई ||

कोशिश तो की बहुत, पर सफलता ना मैंने पायी –
यादों में वो बस गयी, मेरे दिल से ना निकल पायी ||
नहीं चाहता की हो ज़माने में उसकी रुसवाई,
घर-घर का किस्सा हो, उसका किस्सा-ए-बेवफाई ||

कचोट रहे हैं आज मुझे, मेरा अकेलापन-औ-मेरी तन्हाई,
आज किसी बेवफा की, मुझे फिर है याद आई ||

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वो और मैं ( आज का ज़माना )


११ नवम्बर, १९९५  || ८:३५  – ८:५५ 

जब मैं ना था, वो तब भी था |
आज मेरा वजूद है, वो अब भी मौजूद है ||

कल मेरा साया भी ना रहेगा,
वो तब भी यहीं रहेगा |
ये ज़ालिम ज़माना बेदर्द था,
बेदर्द है, और बेदर्द ही रहेगा ||

एक वक़्त था वो कहते थे,
शिष्टाचार, समाजवाद, हमारा नारा है,
पर आज का ज़माना तो,
भ्रष्टाचार और जातिवाद का मारा है ||

जिसने भी आवाज़ उठाई,
बेचारे ने है जान गँवाई –
वाह रे ज़माने,
वाह रे खुदाई!

भूत-पिशाच अब आते नहीं,
वो इंसानों से डरते हैं,
उनके आचार-विचार देखकर,
उनकी पूजा करते हैं ||

वो दिन हैं फिर गए,
जब प्यार हमें था एक-दूजे से,
आज हम प्यार हैं करते,
सिर्फ मज़हब-औ-कौमों से ||

पर क्या ये हकीकत है? नहीं |

हकीकत में हममें प्यार है,
नेताओं में लड़ाई है,
कुर्सी पाने की होड़ में,
हम में फूट डलवाई है –
सिर्फ हो सके कुर्सी उनकी,
हमें दी जुदाई है ||

बदल डालो इस ज़माने को,
यहाँ रहते नहीं इंसान हैं,
इंसानियत है इनकी मर चुकी,
ये बन चुके हैवान हैं ||

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